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Chapter 16
धीरे-धीरे अंतरा और यश दोस्त बनते जा रहे थे।
अंतरा कभी-कभी यश से उसके स्वाध्याय के बारे में पूछ लिया करती थी….कितना पढ़ा, क्या समझा, क्या समझ नहीं आया।
और यश, अंतरा को उसकी social anxiety से बाहर आने के छोटे-छोटे उपाय बताता रहता था…भीड़ से भागने के नहीं, उसमें अपने लिए जगह बनाने के।
दोनों को अब एक-दूसरे की संगति अच्छी लगने लगी थी। क्योंकि जब जीवन में कोई ऐसा मिल जाए, जो आपको improve करने के लिए inspire करे, तो उसे संभालकर रखना चाहिए। दुनिया में गिराने वालों की कमी नहीं होती…..पर उठाने वाले बहुत कम मिलते हैं।
अंतरा यह बात जल्दी समझ गई थी। उसने किताबों में प्रेम कहानियाँ पढ़ी थीं, कुछ Bollywood movies भी देखी थीं। पर वह जानती थी….किताबों और फिल्मों वाला प्यार अक्सर राग की पुष्टि करता है। उसे ऐसा जीवनसाथी चाहिए था, जो उसे सिर्फ राग के मार्ग में नहीं, वीतरागता के मार्ग में भी आगे बढ़ाए।
अब उसे यश में वह संभावना दिखने लगी थी। यश का स्वाध्याय भले ही वर्षों पुराना न हो, पर जिनधर्म के प्रति उसका प्रेम और समर्पण अंतरा के मन को छूने लगा था। उसकी सीखने की ललक, और स्वयं को बेहतर बनाने की कोशिश….यही उसकी सबसे बड़ी योग्यता थी।
यश ने कभी गंभीरता से यह नहीं सोचा था कि उसे अपनी जीवनसंगिनी में कौन-सी qualities चाहिए।
लेकिन अंतरा को देखकर उसे यह साफ़ समझ आने लगा था….कि दिखावे की ज़िंदगी ज़्यादा दिन नहीं निभाई जा सकती। अंतरा की सहजता, उसकी सरलता और धर्म को practically जीवन में उतारने की समझ….ये सब उसे अपनी ओर खींच रहे थे।
एक दिन यह सब शब्दों में बदल गया….
Yash: तुमसे कुछ कहना था, अंतरा…
Antra: हाँ, बोलो 🙂
Yash: कुछ दिनों से…
Antra: हाँ… कुछ दिनों से क्या? 👀
Yash: कुछ दिनों से मुझे तुमसे बातें करना अच्छा लगने लगा है…
please नाराज़ मत होना 🙈
पर मैं सोच रहा था कि….
अगर तुम भी ऐसा ही feel करती हो तो शायद हमें दोस्ती से थोड़ा आगे बढ़ जाना चाहिए…
Antra: ☺️✨
Yash: ये smile थोड़ा risky है 😅 कुछ तो बोलो….
तुम्हारी चुप्पी से डर लग रहा है 😬
Antra: सब कुछ बोला नहीं जाता, यश… 🌿
Yash: तुम्हें पता है ना…..मैं अन्तर्यामी नहीं हूँ 😐
Antra: बुद्धू हो तुम 😄
हाँ… अब हमें अपने parents से बात कर लेनी चाहिए 🤍
Yash: 🥳🙌
उस chat के बाद दोनों ने कुछ नहीं लिखा। पर फोन हाथ में बार-बार आता रहा।
रात गहरी हो चुकी थी, घर में सब सो गए थे, पर नींद दोनों से दूर थी। कुछ देर बाद फोन फिर vibrate हुआ।
Antra: सोए नहीं?
Yash: नहीं…. तुम?
Antra: नींद नहीं आ रही 😐
Yash: same here
कल parents से बात करनी है…
थोड़ा डर लग रहा है
Antra: हाँ… मुझे भी
Yash: अगर मम्मी ने ज़्यादा सवाल पूछ लिए तो? 😅
Antra: तो सच बोल देंगे … हमने कुछ गलत तो किया नहीं
Yash: तुम इतनी calm कैसे रह लेती हो?
Antra: मैं calm नहीं हूँ…. बस दिखा रही हूँ 😄
Yash: मुझे अच्छा लग रहा है कि इस बार
मैं ये सब अकेले नहीं कर रहा
Antra: मुझे भी…
कुछ seconds तक दोनों online रहे, पर किसी ने कुछ नहीं लिखा।
फिर अंतरा ने message भेजा—
Antra: जो भी हो कल honest रहेंगे
Yash: हाँ..
Antra: deal
Yash: deal 🙂
Chapter 17
सुबह तो रोज़ होती थी, पर आज जैसी सुबह यश की ज़िंदगी में शायद कभी नहीं हुई थी। आज वह पहली बार सच में nervous था।
मंदिर वह सुबह जल्दी ही हो आया था, लेकिन मन वहाँ से लौटकर भी शांत नहीं हुआ था।
आज वह अपनी ज़िंदगी का एक बहुत बड़ा decision लेने वाला था—ऐसा decision, जिस पर उसे जीवन भर अटल रहना था।
पापा से बात करने से पहले मम्मी से बात कर लेना उसे ज़्यादा आसान लगा। सोचने में यह काम आसान लग रहा था, पर असल में उसके दिल की धड़कनें तेज़ थीं और गला बार-बार सूख रहा था।
मम्मी kitchen में lunch की तैयारी कर रही थीं। यश धीरे-धीरे kitchen में गया, लेकिन उसके मुँह से आवाज़ ही नहीं निकली।
“कुछ चाहिए था, बेटा…?” मम्मी को उसकी आहट आ गई थी।
“वो… पानी चाहिए था बस।”
यश ने पानी लिया और पीने लगा।
“क्या हुआ है?”…..मम्मी उसकी चाल-ढाल से समझ गई थीं कि वह कुछ कहना चाहता है।
“कुछ नहीं मम्मी…”
“माँ हूँ तेरी,” मम्मी ने सहजता से कहा।
“बिना कहे ही समझ जाती हूँ। बोल, क्या बात है…”
यश ने थोड़ी देर रुककर कहा….“वो मम्मी… अंतरा याद है आपको?”
मम्मी ने हाथ में पकड़ा काम रख दिया और यश की तरफ देखा।
यश ने जैसे हिम्मत जुटाकर एक ही साँस में बोल दिया….“मुझे वो पसंद है। और हम दोनों शादी करना चाहते हैं।”
मम्मी अचानक हँस पड़ीं।
“वो तो anti-social थी ना, बेटा…?”
“अभी भी है।”
“तुम्हें कैसे पता?”
“वो…”
अब माँ से कुछ छुपाना नामुमकिन था। यश ने शिविर में हुई मुलाकात, उसके बाद की बातचीत और दोनों के बीच बढ़ती समझ….सब कुछ बता दिया।
मम्मी तो जैसे सातवें आसमान पर थीं। उनकी पसंद की बहू सच में घर आने वाली थी।
उन्होंने देर न करते हुए यश के पापा को फ़ोन किया। पापा की खुशी का भी ठिकाना नहीं रहा।
अब बारी थी अंतरा के घर फ़ोन करने की।
लेकिन यश के घर से फ़ोन जाने से पहले ही वहाँ से फ़ोन आ गया। अंतरा सब कुछ अपने घर पर बता चुकी थी।
दोनों परिवारों ने बिना देर किए engagement का program रखने का तय किया। ज़्यादा ताम-झाम न करते हुए, सादगी से यह program यश के घर ही किया जाएगा—ऐसा निश्चित हुआ।
सिर्फ़ कुछ पास के रिश्तेदारों और खासमखास मित्रों की मौजूदगी में, दो दिन बाद अंतरा और यश एक-दूसरे को अंगूठी पहनाकर इस दोस्ती को रिश्तेदारी में बदलने वाले थे।
Chapter 18
Engagement Day
यश के घर में चहल-पहल की आवाज़ें गूँज रही थीं। सब लोग किसी न किसी तैयारी में लगे थे।
मिठाइयों के थाल सजे हुए थे और घरवालों ने मिलकर हल्का-सा decoration भी कर दिया था। सब कुछ सादा था, पर अपनेपन से भरा हुआ।
लड़कीवाले आने ही वाले थे।
यश को अजीब-सी घबराहट हो रही थी। वह बार-बार शीशे में अपना चेहरा देखता, बाल ठीक करता, कभी कुर्ते की सिलवटें सही करता।
पियूष भी आ चुका था। अपने दोस्त को उसने इतना बेचैन शायद किसी exam से पहले भी नहीं देखा था।
“पियूष… मेरा decision सही तो है न?”
“तुझे अंतरा पसंद है न?”
“बहुत…”
“तो फिर डर किस बात का है?”
“मैं उसे खुश रख पाऊँगा न? कहीं अपने opinions उस पर थोप तो नहीं दूँगा? मुझसे better भी तो लड़के हैं… फिर उसने मुझे ही क्यों चुना?”
पियूष ने उसे ध्यान से देखा।
“Perfect तो कोई नहीं होता। हमें सबकी imperfections में से अपने लिए जो सबसे perfect imperfection होती है, वही choose करनी होती है।”
यश थोड़ी देर चुप रहा।
“कहीं हमारा झगड़ा हो गया तो? मैं ठहरा थोड़ा दिखावटी… और वो इतनी सरल।”
“झगड़ा तो हर couple में होता है,” पियूष ने सहजता से कहा।
“Differences होना बुरी बात नहीं है। बस thought process match होना चाहिए।”
“पर यार… आजकल कितने divorces हो रहे हैं। हम निभा पाएँगे क्या?”
पियूष हल्का-सा मुस्कुराया।
“पता है, कभी-कभी मेरा और तेरी भाभी का भी झगड़ा हो जाता है। पर हम कभी साथ छोड़ने की नहीं सोचते। हर problem का solution साथ बैठकर निकाल लेते हैं।
और एक बात याद रखना….जब कभी एक-दूसरे में दुश्मन दिखने लगे न, तो थोड़ी देर के लिए पति-पत्नी नहीं,बस साधर्मी समझकर देख लेना। और अगर वो भी न दिखे, तो द्रव्य के स्वतंत्र परिणमन को याद कर लेना।”
यश ने गहरी साँस ली।
“सच है… अगर सब कुछ स्वतंत्र है, तो control करने की भावना अपने आप खत्म हो जाती है।”
“Exactly,” पियूष बोला।
“ज़्यादातर relationships इसलिए fail होती हैं, क्योंकि हम उनमें over-expect करने लगते हैं।”
इन बातों से पियूष, यश को cold feet होने से बचा ही रहा था कि तभी यश का छोटा भाई, सुयश, दौड़ता हुआ आया….
“भाभी आ गयीं!”
यश बाहर की ओर बढ़ा। उसकी नज़रें सबसे पहले अंतरा को ढूँढने लगीं।
वह वहीं खड़ी थी…उसी जगह, जहाँ कभी उन दोनों का झगड़ा हुआ था। पर आज…वह उसकी अंतरा थी।
लाल बनारसी साड़ी में वह किसी गुलाब के फूल जैसी लग रही थी। यश की आँखें जैसे उसी पर टिक गईं।
पियूष ने हल्का-सा धक्का देकर उसे होश में लाया।
अंतरा के गाल उस लाल साड़ी को जैसे competition दे रहे थे। यश को देखते ही वह इतनी शरमा गई कि चेहरा और भी दमक उठा।
देव–शास्त्र–गुरु का स्मरण करके engagement ceremony का शुभारंभ किया गया। बड़ों की सहमति से दोनों ने एक-दूसरे को अंगूठी पहनाई।
फिर दोनों ने घर के सभी बड़ों के पैर छुए। उसके बाद सब लोग नाश्ता करने और हँसी–मज़ाक में busy हो गए।
यश और अंतरा को बहुत कुछ कहना था, पर इतने लोगों के सामने दोनों को संकोच हो रहा था।
अंतरा की दीदी ने सब समझ लिया और दोनों को master bedroom की बालकनी की ओर भेज दिया।
Chapter 19
यश धीरे से अंतरा के पास आया और उसके कान के पास हल्की आवाज़ में बोला…
“You are looking beautiful…”
अंतरा ने शर्मा कर उसकी तरफ देखा। कुछ पल के लिए कुछ कह ही नहीं पाई। फिर दोनों हल्की-फुल्की, बिल्कुल normal बातें करने लगे….जैसे कुछ भी खास नहीं हुआ हो, जबकि दोनों जानते थे कि बहुत कुछ बदल चुका है।
इतने में उन्हें bedroom के अंदर से आवाज़ें सुनाई देने लगीं। बालकनी में भेजने के बाद दीदी ने जानबूझकर पर्दा लगा दिया था, ताकि कोई उन्हें देख न सके और वे आराम से बात कर पाएं।
अंदर से आवाज़ आई—
“हमारा plan कामयाब हो गया।”
“हाँ… और किसी को शक भी नहीं हुआ।”
“उन दोनों को लग रहा है कि उन्होंने अपनी मर्ज़ी से एक-दूसरे को choose किया है।”
“हाँ… और यही तो हम चाहते थे। देखो न, इन दोनों की जोड़ी कितनी अच्छी लग रही है।”
यश और अंतरा एक-दूसरे को देखने लगे। आवाज़ें उन्हें बिल्कुल साफ़ सुनाई दे रही थीं। दोनों ही अपनी-अपनी मम्मियों की आवाज़ पहचान चुके थे। वे बालकनी से अंदर आ गए।
उन्हें देखते ही दोनों मम्मियाँ चुप हो गईं।
“Plan… कौन-सा plan, मम्मी?”यश ने सीधे पूछ लिया।
“हाँ मम्मी… किसे क्या शक नहीं हुआ?”अंतरा भी खुद को रोक नहीं पाई।
अब छुपाने का कोई मतलब नहीं रह गया था। वैसे भी अब दोनों एक-दूसरे को पसंद कर चुके थे, तो सच सामने आ जाने से कुछ बदलने वाला नहीं था।
“तुम दोनों को मिलाने का plan,”यश की मम्मी ने मुस्कुराते हुए कहा।
“कभी सोचा है,” अंतरा की मम्मी ने बात आगे बढ़ाई,
“कि तुम दोनों एक ही शिविर में, एक ही topic पर….एक video और एक book के साथ… कैसे पहुँच गए?”
यश और अंतरा ने एक-दूसरे की तरफ देखा। अब तक उन्होंने इस पर ध्यान ही नहीं दिया था। पर अब सारी maths अपने-आप जुड़ने लगी।
अंतरा की book का topic…शिविर में ज़बरदस्ती भेजा जाना…सब उसकी मम्मी का idea था।
और इधर यश को video और शिविर….दोनों के ideas उसकी मम्मी ने ही दिए थे।
“असल में,” यश की मम्मी बोलीं,
“जब उस दिन तुम दोनों किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचे, तब हमने आपस में बात की। तुम दोनों को एक-दूसरे का पूरक समझकर हमने ये plan बनाया।”
“लेकिन,” अंतरा की मम्मी ने तुरंत जोड़ दिया, “शिविर में और शिविर के बाद जो कुछ भी हुआ, वो तुम दोनों की अपनी होनहार थी। उसमें हमारा कोई हाँथनहीं था। इसलिए पसंद तो तुम दोनों ने ही एक-दूसरे को किया है…हमने तो बस तुम्हें मिलाने की साज़िश की थी।”
यह सुनकर यश और अंतरा दोनों हँस पड़े। उन्हें अंदाज़ा ही नहीं था कि उनकी मम्मियाँ ऐसे टीवी-सीरियल वाले काम भी कर सकती हैं।
दोनों ने आगे बढ़कर अपनी-अपनी मम्मियों को गले लगा लिया।
और उस पल यह साफ़ हो गया…सिर्फ़ यश और अंतरा ही नहीं, उनकी मम्मियाँ भी अब सहेलियाँ बन चुकी थीं।
उपसंहार
1 साल बाद
श्रवणबेलगोला की तलहटी में सूरज ढल रहा था।
यश चुपचाप सीढ़ियों पर बैठा था। उसके हाथ में फोन था, पर स्क्रीन काली पड़ी थी।
पिछले तीन दिनों से उसने न कोई रील अपलोड की थी, न कोई स्टेटस डाला था।
“क्या हुआ? नेटवर्क नहीं आ रहा?”
पीछे से अंतरा की आवाज़ आई।
वह अपनी सादगी में वैसी ही लग रही थी जैसी हमेशा….शांत, स्थिर और अपने भीतर ठहरी हुई।
यश हल्का-सा मुस्कुराया।
“नेटवर्क तो है, अंतरा… पर शायद अब उसकी ज़रूरत नहीं रही।
कल तक मुझे डर लगता था कि अगर मैंने पोस्ट नहीं किया, तो लोग मुझे भूल जाएँगे। पर आज यहाँ बैठकर लग रहा है कि दुनिया याद रखे या न रखे, मैं ख़ुदको तो याद आ गया हूँ।”
अंतरा उसके पास बैठ गई। उसने यश के चेहरे पर वह सुकून देखा, जो उसने पहले कभी नहीं देखा था।
आज वह influencer नहीं लग रहा था… बस एक साधारण-सा इंसान, जो खुद को सुनने की कोशिश कर रहा था।
“तुम्हें पता है,” यश ने कहा,
“मैं सालों से प्रभावना के पीछे भाग रहा था। मुझे लगता था धर्म मतलब शोर, आयोजन, और सबको दिखाना कि हम कितने सही हैं। पर तुमने सिखाया कि असली प्रभावना, आराधना के बिना अधूरी है। अगर भीतर दीया नहीं जला, तो बाहर की रोशनी किस काम की?”
अंतरा की आँखों में हल्की-सी चमक आ गई।
“प्रभावना गलत नहीं है, यश,” उसने धीरे से कहा।
“पर वो मंज़िल नहीं हो सकती। जब पानी पूरा भर जाता है, तो वह अपने आप छलकता है। वही सच्ची प्रभावना है। हमें छलकने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, बस खुद को भरने पर ध्यान देना चाहिए।”
यश ने फोन जेब में रख लिया।
“तुम सही कहती हो। ‘यश’ यानी शोहरत के पीछे भागते-भागते मैं यह भूल गया था कि असली यश तो खुद को जानने में है।”
उसने अंतरा की ओर देखा।
“अंतरा, मैं धन्य हूँ तुमने मेरा साथ दिया है और मुझे इस मार्ग पर लगाया है | तुम्ही मेरी सच्ची साथी हो|’धर्मपत्नी’ का सही अर्थ मैंने तुम्हारे साथ रह कर ही जाना है |”
अंतरा ने कुछ नहीं कहा। बस वही जानी-पहचानी मुस्कान उसके चेहरे पर आ गई।
यश समझ चुका था…
अब उसे कैमरे के फ़िल्टर की ज़रूरत नहीं है। उसकी कहानी अब लाइक और कमेंट से आगे बढ़कर एक सच्ची आराधना की ओर जा रही थी।
सीढ़ियाँ उतरते हुए उसने एक बार पीछे मुड़कर बाहुबली भगवान को देखा|
मानो बाहुबली भगवान ने उसे कहा-
“प्रभावना से परे, अब तुम्हारी सच्ची आराधना शुरू होती है।”
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