यश की अंतरात्मा – Part 6

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Chapter 13

शाम हो चुकी थी। जोर-शोर से भक्ति हुई। फिर प्रवचन। उसके बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम।

कार्यक्रम से पहले यह तय था कि यश की documentary दिखाई जाएगी। बड़ी screen पर documentary चली।

हॉल शांत था। लोग देख रहे थे…कोई पहली बार, कोई दूसरी बार। यश documentary नहीं देख रहा था। वह भीड़ में किसी को ढूँढ रहा था।

उसे वह दिख गई। अंतरा की नज़रें screen पर थीं। उसके चेहरे से यह समझ पाना मुश्किल था कि वह क्या सोच रही है।

Documentary खत्म हुई। तालियाँ बजीं। लोगों ने यश की तारीफ़ की। कुछ ने पास आकर बधाई भी दी।

तभी मंच से एक नई book का announcement हुआ | Announce करने वाला बोलते-बोलते खुद ही रुक गया—

“अभी आपने दक्षिण भारत के मंदिरों पर जो video देखा… उसे जैसे पूरा करती हुई यह किताब है, जो इन मंदिरों की पुरानी कहानियाँ और संघर्ष हमें बताती है।

अगर आप सिर्फ़ किताब पढ़ेंगे, तो मंदिरों की भव्यता नहीं देख पाएँगे और अगर सिर्फ़ video देखेंगे, तो इन मंदिरों का इतिहास नहीं जान पाएँगे।

यह video और यह किताब….जैसे एक-दूसरे के पूरक हों। इसलिए मैं चाहूँगा कि इस video के निर्माणकर्ता और इस पुस्तक की लेखिका— दोनों मंच पर आएँ।”

भीड़ में हलचल हुई।

“हमारे साधर्मी भाई यश…जो सोशल मीडिया के जगत में विख्यात हैं… और दक्षिण भारत के मंदिरों के इतिहास पर शोध करने वाली हमारी साधर्मी बहन अंतरा…दोनों आज बधाई के पात्र हैं।”

अंतरा जैसे-तैसे उठी। उसे मंच पर जाने का डर था। और अब….यश के साथ। पर फिर भी वह हिम्मत करके मंच पर चली ही गयी | 

अंतरा ने यश की documentary पहली बार देखी थी। Research के दौरान उसने अपना WhatsApp तक delete कर दिया था। उसे अंदाज़ा नहीं था कि यश का कार्य इतना गहरा है।

यश के लिए भी अंतरा का यूँ किताब लिखना नया था। उसे नहीं पता था कि किताबों के ज़रिये भी इतनी प्रभावना हो सकती है।

दोनों मंच पर खड़े थे। तालियों के बीच… पर अपने-अपने भीतर शांत। अलग-अलग रास्तों से चलते हुए एक ही मंजिल पर आ पहुँचे थे।

उन्होंने एक-दूसरे को देखा। इस बार नज़रों  में सवाल थे। और शायद कुछ बातें भी… जो सही समय आने पर बाहर आना चाहती थीं।


Chapter 14

अगले दिन सुबह 5 बजे

शिविर जहाँ लगा था, उसके पास ही एक पहाड़ी पर जिनमंदिर था।
अंतरा अपनी आदत के अनुसार सुबह बहुत जल्दी उठ गई और पहाड़ी की ओर चल पड़ी।

हवा ठंडी थी। आसमान अभी पूरा उजला नहीं हुआ था। वह जैसे ही चढ़ने लगी, पीछे से किसी के आने की आहट सुनाई दी।

कहीं कोई जानवर तो नहीं… एक पल को वह डर गई।
उसे लगा शायद अकेले ऐसे पहाड़ी पर आना ठीक नहीं था। वह कुछ सीढ़ियाँ चढ़ती, फिर पीछे मुड़कर देखती। चढ़ने की उसे आदत नहीं थी, इसलिए थोड़ी-थोड़ी देर में रुक जाती थी।

थोड़ा आगे बैठकर वह विश्राम कर रही थी कि नीचे से कोई तेज़ी से चढ़ता हुआ दिखाई दिया। अँधेरा था…चेहरा साफ़ नहीं दिख रहा था।

अंतरा ने सोचा, अगर ये कोई साधर्मी है तो इसके साथ ऊपर तक चली जाऊँ। जैसे ही वह पास आया, अंतरा उसे पहचान गई। उसके कुछ कहने से पहले ही वह बोला—

“साथ में ऊपर चलें?”

एक क्षण के लिए अंतरा को लगा….जैसे वह सिर्फ़ पहाड़ी नहीं, लोक के ऊपर सिद्धशिला में साथ जाने की बात कर रहा है।

दोनों साथ चलने लगे। थोड़ी देर बाद अंतरा बोली, “वीडियो… अच्छी थी।”

“Thanks! और तुम्हारी book के लिए congratulations… मैं जल्द ही पढ़ने की कोशिश करूँगा।”

यश ने कहा। अंतरा थोड़ी झिझकी।

“Sorry… उस दिन मैंने आपके ही घर में कुछ ज़्यादा rudely बोल दिया।”

“I’m sorry too… उस दिन मैंने भी पता नहीं तुम्हें क्या-क्या बोल दिया था।”

कुछ कदम और चढ़ने के बाद अंतरा रुक गई। साँस तेज़ हो गई थी। यश भी उसके साथ रुक गया।

“मेरी तो साँस चढ़ी जा रही है… और तुम तो यहाँ trekking के मज़े लेते दिख रहे हो।”

यश हल्का-सा मुस्कुराया।

“हाँ… वो मैं काफी तीर्थों की वंदना करता हूँ ना। Video बनाने के लिए पहाड़ पर चढ़ना ही पड़ता है। आदत-सी हो गई है।”

तभी पूरब की ओर हल्की लालिमा फैलने लगी। यश ने कहा, “वो देखो… sunrise।”

“इतना अच्छा होता है क्या? तुमने तो बहुत देखे होंगे।”

“हाँ… तुमने नहीं देखे क्या?”

अंतरा कुछ पल चुप रही।

“सच बताऊँ तो… मैं कभी कहीं गई ही नहीं।”

“Friends के साथ तो सब जाते हैं…”

“Umm…”

वह आगे कुछ नहीं बोली। यश समझ गया…वह share नहीं करना चाहती। उसने बात को और नहीं खिंचा और ऊपर जाने के लिए ready हो गया –

“चलो… अब थोड़ा ही बाकी है। हम पहुँचने वाले हैं।”

थोड़ी देर में दोनों मंदिर पहुँच गए।

दर्शन किए। पूजन किया।

इस बार वे अलग-अलग बैठे थे, फिर भी कहीं न कहीं साथ ही।

जब तक बाकी शिविरार्थी ऊपर आए, उनकी पूजन पूरी हो चुकी थी। नीचे उतरते समय, सीढ़ियों के बीच अचानक अंतरा बोली, 

“मेरे… अब कोई friends नहीं हैं…”

यश रुका नहीं, बस उसकी गति धीमी हो गई।

“मैं सिर्फ़ social media ही नहीं, life में भी बहुत-सी चीज़ों से बचती रही…भीड़, conversations… Books को ही मैंने अपना दोस्त बना लिया। मैं अपने साथ ही खुश रहती हूँ। मुझे किसी की ज़रूरत महसूस नहीं होती…पर कभी-कभी… अकेलापन feel होने लगता है।”

यह बात उसने आज तक किसी से नहीं कही थी। पर यश से छुपाने की ज़रूरत उसे नहीं लगी।

यश कुछ पल चुप रहा, फिर बोला—

“आराधना का मार्ग आखिर स्वाधीनता का ही मार्ग है।

पर से जुड़ोगे तो प्रसिद्ध होगे,
स्वयं से जुड़ोगे तो सिद्ध हो जाओगे।

मुझे ही देख लो। मुझे प्रसिद्धि मिल गई….कहने को हर कोई मुझे जानता है, दोस्त कहता है। फिर भी अंदर एक खालीपन है।

मैंने अपना सारा time दूसरों को धर्म की महिमा बताने में invest कर दिया। पर असली—ultimate investment खुद को जानने और अपने साथ वक्त बिताने में है ….जो तुम कर रही हो।”

यश ने जैसे अपने मन के दरवाज़े भी खोल दिए थे।

बात करते-करते वे कब नीचे पहुँच गए, अंतरा को पता ही नहीं चला।

फिर दोनों अपने-अपने रास्तों पर चल दिए… बिना वादा किए, बिना किसी अपेक्षा के।


Chapter 15

शिविर का आख़िरी और तीसरा दिन

“नियम बंधन नहीं, सुरक्षा हैं।
हम अक्सर नियमों को ‘बेड़ियाँ’ समझ लेते हैं, लेकिन असल में नियम हमें safe रखते हैं।
जैसे traffic signal का नियम हमें accident से बचाता है, वैसे ही जीवन के नियम हमें मानसिक और आध्यात्मिक भटकाव से बचाते हैं।

नियम ‘कट्टरता’ (fanaticism) के लिए नहीं होने चाहिए, जिससे दूसरों को छोटा महसूस कराया जाए।
नियम ‘दृढ़ता’ (conviction) के लिए होने चाहिए….जो आपको भीतर से शांत और मज़बूत बनाए।

नियम हमें यह अहसास कराते हैं कि हमारा स्वभाव स्वाधीन है। हम अपनी भूलों से दुखी होते हैं, और सही नियमों….अनुशासन….के माध्यम से अपनी भूल सुधारकर सुखी हो सकते हैं।”

यश शांत बैठा सुन रहा था।
अब वह भी कोई नियम लेना चाहता था….ऐसा नियम, जो शिविर से लौटने के बाद भी उसके साथ रहे। पर उसे समझ नहीं आ रहा था कि इस विषय में किससे सलाह ले।

तभी उसे याद आया….अंतरा का अष्टमी और चतुर्दशी को एकासना का नियम है।

उसे लगा, इस बात पर उसी से चर्चा करना ठीक रहेगा। 

अंतरा का फोन नंबर उसके पास नहीं था। उसने उसे ढूँढना शुरू किया। थोड़ी देर बाद वह दिख गई….दो और लड़कियों के साथ खड़ी कुछ बात कर रही थी।

उसे किसी और से बात करते देख यश को अच्छा लगा। शायद अंतरा भी अब अपनी छोटी-सी दुनिया से बाहर आना चाहती थी। जब तक यश उसके पास पहुँचा, वे दोनों लड़कियाँ जा चुकी थीं।

“तो… friends बना ही लिए तुमने आखिर?”
यश ने हल्के से पूछा।

“हाँ,” अंतरा मुस्कुराई। “ये दोनों भी मेरी तरह किताबों की शौकीन हैं। मेरी book देखने के बाद मिलने आई थीं। उन्हें भी अपनी book लिखनी है। बस बातों-बातों में दोस्ती हो गई।”

फिर उसने पूछा….“तुम बताओ…?”

“मुझे तुम्हारी help चाहिए।”

अंतरा ने हल्का-सा आश्चर्य जताया।
“तुम्हें मेरी help? मुझे लगा तुम्हारे तो बहुत दोस्त हैं।”

“हैं,” यश ने स्वीकार किया, “पर इस matter में तुम ही मेरी मदद कर सकती हो।”

“अच्छा… बताओ।”

“मैं यहाँ से जाने से पहले कोई नियम लेना चाहता हूँ। ताकि यहाँ जो पढ़ा है, वो भूल न जाऊँ।”

अंतरा ने बिना सोचे कहा….“Daily minimum 15 से 20 मिनट स्वाध्याय का नियम ले लो।”

“एक घंटे का ले लेता हूँ,” यश तुरंत बोला।

अंतरा ने उसे ध्यान से देखा।

“भावुकता में नियम नहीं लिए जाते,” उसने शांति से कहा।
“अभी तुम यहाँ हो….यहाँ तुम्हारे पास समय भी है, सत्संगति भी। वहाँ दोनों ही कम होंगे।

फिर तुम frustrate हो जाओगे, और नियम का परिणाम भी बिगड़ जाएगा। नियम परिणामों की विशुद्धि के लिए होते हैं। इसलिए पहले कम समय का नियम लो… बाद में धीरे-धीरे बढ़ाते जाना।”

यश को उसकी बातें भीतर तक छू गईं। उसे पहली बार लगा….अंतरा सच में स्वाध्यायी और विचारवान है।

वह खुद इतना long-term नहीं सोचता था। उसकी decision-making की आदत भी reels की तरह fast-paced हो गई थी। पर आगे-पीछे का विचार करना भी ज़रूरी होता है….यह बात आज उसे साफ़ समझ आ रही थी।

“हाँ… तुम सही कह रही हो,” यश बोला। 

“मैं इतना ही नियम लेता हूँ। पर अगर आगे कभी कोई doubt आया, तो तुम्हें contact कैसे करूँगा? मेरे पास तो तुम्हारा नंबर भी नहीं है।”

अंतरा यश का भाव समझ चुकी थी। वह मुस्कुराई, अपने फोन का dial-pad खोला और बिना कुछ कहे उसकी ओर बढ़ा दिया।

यश ने अपने फोन से miss-call किया। कुछ पल दोनों बिना कुछ बोले वहीं खड़े रहे।

शिविर अब अपने समापन की ओर था।
यह उनकी आख़िरी मुलाकात थी….इसके बाद कब मिलेंगे, यह दोनों को नहीं पता था।

चुप्पी को तोड़ते हुए यश ने अचानक पूछा… “एक बार फिर कोशिश करें?”

अंतरा समझ गई थी उसका आशय। फिर भी clarity के लिए पूछा… “किस चीज़ की?”

यश ने बिना किसी बनावट के कहा….“वही… जो हमारे parents चाहते हैं। शादी ……”

अंतरा मुस्कुराई। उस मुस्कान में एक शांत स्वीकृति थी। वह कुछ नहीं बोली। हल्की-सी शर्मा कर वहाँ से चली गई।


क्या यश और अंतरा के प्यार की ये एक नयी शुरुवात है? जानने के लिए पढ़िए अगला पार्ट !

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