यश की अंतरात्मा – Part 5

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Chapter 10

दो महीने बाद

“ये देख पियूष… मेरी documentary। सबसे पहले तुझे ही दिखा रहा हूँ।”

यश के चेहरे पर हल्की थकान थी, लेकिन आँखों में चमक साफ़ दिख रही थी। पिछले दो महीनों से वही चमक उसके साथ जागती और सोती थी। South के जैन मंदिरों पर बनी यह documentary सिर्फ़ एक video नहीं थी…..यह उसके भीतर जमे हर भाव, हर यात्रा और हर अकेलेपन का निचोड़ थी।

कर्नाटक के छोटे-बड़े लगभग सभी जैन मंदिर उसने cover किए थे। श्रवणबेलगोला की विशाल शांति से लेकर मूडबिद्री की गलियों में छिपे प्राचीन मंदिर, धर्मस्थल की आस्था, उडुपी की सादगी और अरेट्ठीपुर की चट्टानों में बसी तपस्या—हर जगह वह खुद camera उठाए घूमता रहा था।
कोई production team नहीं, कोई luxury नहीं। सिर्फ़ वह, उसका camera और एक अंदरूनी बेचैनी… कि ये सब लोगों तक पहुँचना चाहिए।

इस project को record करने में पूरा डेढ़ महीना लग गया था। IT job में उसने work from anywhere की special permission ली थी। दिन में meetings, रात में footage sort करना, और बीच-बीच में buses, trains, lodges और मंदिरों की सीढ़ियाँ। शरीर थक जाता था, पर मन नहीं रुकता था।

आज documentary पूरी तरह edit होकर upload होने को तैयार थी। बस कुछ final touches बाकी थे। 

Documentary देखते ही पियूष से रहा नहीं गया। उसने यश को गले लगा लिया।

“भाई, तेरे जितना मेहनती मैंने शायद ही कोई देखा है । Full-time job के साथ इतना बड़ा project करना कोई आसान काम नहीं है। जिनधर्म के लिए तेरी जो भक्ति है न… उसके बारे में जितना कहूँ कम लगता है।”

यश हल्का-सा मुस्कुराया।

“बस कर भाई… कहीं मान में इतना न डूब जाऊँ कि खुद को ही सब कुछ समझने लगूँ।”

पियूष ने उसकी तरफ ध्यान से देखा।

“श्रद्धान तो एकदम दृढ़ है तेरा। पर बस एक ही चीज़ की कमी लगती है मुझे…”

“किस बात की?”

“आचरण की… और स्वाध्याय की।”

यह सुनते ही यश थोड़ा गंभीर हो गया। यह बात नई नहीं थी। कहीं न कहीं उसे खुद भी इसका भान था—कि प्रभावना और ‘कुछ बड़ा करने’ की दौड़ में निज-कल्याण पीछे छूटता जा रहा है।

जब उसने ये videos बनाना शुरू किया था, तब उसका motive बहुत साफ़ था। नई पीढ़ी को धर्म से जोड़ना।
उसे अच्छा नहीं लगता था कि आजकल young लोग मंदिरों से जैसे गायब ही होते जा रहे हैं। उसने सोचा था…..अगर मंदिरों को इतना सुंदर, इतना जीवंत दिखाया जाए कि देखने वाला खुद चलकर दर्शन करने आए।

और वह इसमें सफल भी हुआ। लेकिन दूसरों को मंदिर लाने की कोशिश में… उसका अपना मंदिर धीरे-धीरे छूटता चला गया।

Job, shooting, editing…..इन सबके बीच स्वाध्याय की याद कौन दिलाता?
पियूष कोशिश करता था। कई बार यश ने “lecture मत दे” कहकर बात टाल दी थी। पर सच्चा दोस्त होने के नाते पियूष फिर-फिर यह बात किसी न किसी तरह सामने ले ही आता था—क्योंकि जीव की परिणति बदलते देर नहीं लगती।

Documentary upload हुई।

Social media पर वह जिस गति से viral हुई, उसे देख कर यश खुद भी हैरान था।
जैन-अजैन, देशी-विदेशी….सबने देखी। Comments, messages, shares रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।

यश की मम्मी का WhatsApp तो जैसे forwards से भर गया था।
उन्हें अंदाज़ा था कि उनका बेटा अच्छे videos बनाता है, पर इतने अच्छे…..यह आज पता चला था।

वह messages देख ही रही थीं कि यश आया और अचानक उनके गले लग गया।

“मम्मी! Thank you… thank you… thank you… आपका idea बहुत अच्छा था। आपके और पापा के support से ही मैं इस documentary को finish कर पाया हूँ। Thank you for believing in me…”

माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरा।

“मेरे राजा बेटा… मुझे पता था कि मेरा beta ज़रूर धर्म की ध्वजा ऊँची लहराएगा। हर माता-पिता का सपना होता है कि उनकी संतान उनका नाम रोशन करे। आज मुझे तुझ पर गर्व है। इस age में, जब बच्चे parties और clubs में जाकर धर्म को कलंकित करते हैं, तब तूने प्रभावना का मार्ग चुना।”

यश ने धीरे से कहा—

“मम्मी, ये तो आपके दिए संस्कारों का ही कमाल है… जो आज मुझे सद्कार्य करने की प्रेरणा मिलती है।
पर मम्मी…”

“क्या हुआ?”

“मुझे वैसी खुशी नहीं हो रही जैसी होनी चाहिए। कुछ अधूरा-सा है। जैसे मार्ग से मैं कहीं deviate हो रहा हूँ। मेरा true purpose सिर्फ़ प्रभावना तक तो सीमित नहीं हो सकता न…?”

यश अब पूरी तरह गंभीर हो चुका था।
मंदिरों में घूमते-घूमते, शिलाओं और मूर्तियों को निहारते-निहारते उसे यह बोध होने लगा था कि संसार में हम अनंत काल से घूम ही तो रहे हैं।

माँ ने उसे देखते हुए कहा…

“यश, पता है जब तू छोटा था ना… तब तू दादी के साथ मंदिर में घंटों बैठा रहता था। सब बच्चे ऊधम करते थे, पर तुझे तो भगवान की मनहारी मूरत के सामने पद्मासन में बैठकर ध्यान लगाना ही अच्छा लगता था।
सब कहते थे…इतना शांत बच्चा हमने नहीं देखा। बहुत दिनों बाद आज… मेरा वही शांत बेटा मुझे फिर दिखाई दे रहा है।”

यश ने कुछ नहीं कहा। आज उसे कुछ साबित नहीं करना था।
वह बस माँ की गोद में सिर रखकर थोड़ी देर सो जाना चाहता था… जैसे दिखावे, तारीफ़ों और अपेक्षाओं से थक गया हो।

माँ प्यार से उसके बाल सहलाती रहीं…
और बचपन की यादों में उसे धीरे-धीरे वापस ले जाती रहीं।


Chapter 11

उधर यश का video बन चुका था, तो इधर अंतरा की research भी अब पूरी हो चुकी थी।
उसने अपनी research book पर दिन-रात एक कर दिए थे। कई रातें ऐसी थीं जब खिड़की से आती सुबह की हल्की रोशनी उसकी लिखी पंक्तियों पर गिरती थी, और उसे एहसास ही नहीं होता था कि रात कब बीत गई।

किताब पूरी होते ही अंतरा ने सबसे पहले अपने पापा को पढ़ने दी। आख़िर वही तो थे जिन्होंने उसे books और reading की दुनिया से मिलवाया था। काग़ज़ों की खुशबू, किताबों की अलमारियाँ, और चुपचाप पढ़ने का सुख….ये सब उसने अपने पापा से ही सीखा था।

पापा को अपनी book पढ़ते देख, अंतरा को बचपन का वह दिन याद आ गया…
जब पापा उसके लिए हिंदी के कुछ उपन्यास उपहार स्वरूप लाए थे। उस दिन मुंशी प्रेमचंद जी से मिलकर उसे ऐसा लगा था, जैसे किसी पुराने दोस्त से मिल रही हो। कहानी के पात्रों में उसे इंसान दिखते थे, और शब्दों में जीवन।

वह इन्हीं यादों में खोई हुई थी कि तभी पापा की आवाज़ ने उसे present में लौटा दिया।

“बहुत अच्छी book लिखी है, अंतरा!”

अंतरा थोड़ा झिझकी।

“पापा… आप कहीं मेरा दिल रखने के लिए तो ऐसा नहीं बोल रहे हो!!”

आमतौर पर बेटियाँ पापा की लाड़ली होती हैं। उनकी जली रोटी भी पिता को मिठाई जैसी मीठी लगती है। बेटी तिल जितना काम करे तो पिता को वह पहाड़ जैसा लगता है। अंतरा जानती थी… उसके पापा भी इसी श्रेणी में आते थे।

पापा ने किताब बंद की और गंभीर होकर बोले—

“आज एक पिता नहीं… एक पाठक बोल रहा है। मैं इसे अभी print के लिए भेजता हूँ।”

“ठीक है पापा… जैसा आप ठीक समझें।”

किताब तो लिख ली थी, पर उसे पाठकों तक कैसे पहुँचाया जाए….यह अंतरा को समझ नहीं आ रहा था।
उसने यह बात मम्मी से कही।

मम्मी का suggestion सुनकर अंतरा खुश नहीं थी।

“मम्मी, मैं नहीं जा सकती इतने लोगों के सामने…”

“अरे इसमें क्या है? नाचने का थोड़ी बोल रही हूँ। बस दो मिनट के लिए ही तो जाना है stage पर।”

“दो मिनट!!! मम्मी, आपको पता है न कि मुझे stage fear है।”

“तो तुम क्या चाहती हो??….घर-घर जाकर तुम्हारी किताब बाँट के आऊँ? और कोई better idea है तुम्हारे पास?”

“है तो नहीं… पर…”

“पर-वर कुछ नहीं अब। तय हुआ कि next week होने वाले शिविर में तुम्हारी book का विमोचन करेंगे।
वहाँ सब youngsters आएँगे, तो उन्हें ही लाभ होगा। हो सकता है इसी बहाने तुम्हारे दोस्त भी बन जाएँ…”

तभी पापा भी वहाँ आ गए।

“हाँ, मैं 1000 copies print करवाने दे आया हूँ।”

अंतरा चौंक गई। इतनी जल्दी… इतना बड़ा निर्णय…

पापा ने थोड़े रुके हुए स्वर में आगे कहा.

“देखो अंतरा, मैंने आज तक तुम्हें कुछ नहीं कहा…पर मुझे अब तुम्हारी चिंता होने लगी है।
एक महीने से तुम सिर्फ़ मंदिर और घर के सिवा कहीं नहीं गई हो। तुम्हारी दीदी तो अपने ससुराल जा चुकी हैं। हम भी कुछ दिनों में बूढ़े हो जाएँगे… फिर कौन ध्यान रखेगा तुम्हारा?”

अंतरा निरुत्तर थी।
उसे पता था… उसका introvert होना आगे चलकर उसी के लिए दुःखदायी बन सकता है। आख़िर आर्यिका माता और ब्रह्मचारी बहनें भी संघ में रहती हैं. पर वह तो न उस मार्ग पर है, न संसार से  पूरी तरह जुड़ी हुई।
बिना किसी दोस्त, बिना किसी साथी!….यह जीवन कैसे गुज़रेगा?

मम्मी ने बात आगे बढ़ाई…

“अंतरा, mobile पर तुम्हें anti-social रहना है तो रहो। पर असल ज़िंदगी में society की ज़रूरत हर इंसान को होती है। अब तुम्हारी उम्र शादी की हो गई है।”

अंतरा दुखी थी। शादी न होने की वजह से नहीं….पर मम्मी को दुखी देखकर।

उसने थोड़ी रुआँसी आवाज़ में कहा, “ठीक है मम्मी… आप जहाँ बोलोगी, वहाँ चलूँगी।”

मम्मी ने हल्की-सी मुस्कान के साथ अंतरा की ओर देखा, जैसे उन्हें राहत मिली हो…
और अंतरा को लगा… शायद यह मुस्कान ही उसके अगले मोड़ की शुरुआत है।


Chapter 12

एक हफ्ते बाद

आज की भागदौड़ वाली लाइफ में हम अपनी सारी energy और investment बाहर की चीज़ों—जैसे बड़ा career, महंगी गाड़ियाँ और सोशल मीडिया की validation—में लगा देते हैं। पर असली सुकून खुद को पहचानने, यानी Self-Actualization में ही मिलता है।

जैसे पनिहारी सिर पर घड़ा संतुलित रखकर चलती है, वैसे ही हमें दुनिया के सारे काम करते हुए भी अपना main focus अपने  inner peace और स्वभाव पर रखना चाहिए।
यह समझना बहुत ज़रूरी है कि दुख बाहर की situation में नहीं, बल्कि हमारी मान्यता में है। जिस दिन हम चीज़ों और लोगों को वैसे ही accept कर लेते हैं जैसे वे हैं, हमारी आधी मुश्किलें खत्म हो जाती हैं।

Simple शब्दों में कहें तो, दूसरों को impress करने के चक्कर में प्रसिद्ध होने से लाख गुना बेहतर है कि हम खुद से जुड़कर सिद्ध हो जाएँ—और अपनी life के असली मालिक बनें।”

यश को लग रहा था जैसे यह class खास उसी के लिए रखी गई हो।
मम्मी की सलाह पर वह इस विशेष यंगस्टर शिविर में आया था |न युवाओं को जोड़ने के लिए, न कुछ सिखाने के लिए, बल्कि खुद को समझने के लिए।

जिस inner peace की तलाश में वह इतने महीनों से भटक रहा था, अब पहली बार उसे लगा… शायद वह यहाँ मिल सके।

क्लास खत्म हुई। घंटी बजी। लोग उठे, बातें शुरू हुईं, हँसी-मज़ाक गूँजने लगा।

यश बाहर आया। क्लास की बातें अभी भी मन में गूँज रही थीं…..“दुख मान्यता में है…”

उसने सोचा, क्यों न वह जिनमंदिर जाकर थोड़ी देर ध्यान करे। आज पहली बार उसे किसी से बात करने का मन नहीं था। बस अकेले बैठकर सुनी हुई बातों पर विचार करना चाहता था।

पूजन आदि हो चुके थे, इसलिए मंदिर में किसी के होने की संभावना कम थी। उसके कदम अपने-आप मंदिर की ओर बढ़ गए।

अंदर से भक्ति-गीत की मधुर आवाज़ आ रही थी। कोई बहुत एकाग्र स्वर में गा रहा था—जैसे प्रभु से कोई निजी बात कह रहा हो।

“अब तो अर्पण करूँ सब मैं प्रभु के लिए
शाश्वत सुख लखूँ, निज का निज के लिए…

तृप्त होकर बनूँ, आशा-तृष्णा रहित,
मेरा प्रतिक्षण ही निज हेतु अब होएगा।

प्रभु का पर्याय में जब मिलन होएगा,
तो चिदानंद का अनुभवन होएगा…”

यश वहीं ठहर गया। वह ध्यान लगाने आया था, पर इस स्वर ने उसे खींच लिया| वह धीरे से पीछे बैठ गया।

गाने वाले का चेहरा आगे की ओर था… पूरी तरह प्रभु भक्ति में डूबा हुआ। अगला पाठ शुरू हुआ….

“प्रभु बाहुबली ऐसा बल हो ॥ टेक ॥

जीतूँ मैं मोह महाभट को, श्रद्धान सहज ही सम्यक् हो…
निज-पर का भेद-विज्ञान रहे, अंतर शुद्धातम अनुभव हो…

जड़रूप सदा आकुलतामय। ……जड़रूप सदा आकुलतामय। …..”

स्वर अचानक रुक गया। शायद पंक्तियाँ याद नहीं आ रहीं थीं।

यश को यह भक्ति याद थी। उसके मुँह से सहसा निकल गया….

“…भोगों का नहिं आकर्षण हो,
अध्रुव अशरण अरु दुःखरूप,
परिग्रह के प्रति नहिं समर्पण हो…”

गाने वाला चुप हो गया। उसने पीछे मुड़कर देखा।

यश और अंतरा—दोनों एक-दूसरे को पहचान चुके थे। पर न कोई आश्चर्य, न कोई मुस्कान। मंदिर में आने से पहले शायद दोनों सारे बाहरी विकल्प छोड़ आये थे| 

भगवान के समोशरण में जहाँ नेवला-सर्प और गाय-शेर जैसे जन्मजात विरोधी भी अपना वैर भूल जाते हैं, वहाँ ये दोनों तो फिर भी साधर्मी थे। एक दूसरे को आज साधर्मी की तरह उन्होंने पहली बार देखा था|

शब्दों की ज़रूरत नहीं थी। इस बार दोनों ने साथ-साथ भजन गाना शुरू किया। स्वर अलग थे, पर भाव एक।

भजन पूरा हुआ। दोनों ने कुछ नहीं कहा। और अपने-अपने रास्ते चले गए।


क्या ये यश और अंतरा की दोस्ती की एक नयी शरुवात है? जानने के लिए पढ़िए अगला पार्ट !

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