Chapter 3
2 दिन बाद — अंतरा के घर
अंतरा का घर सादगी से भरा हुआ था। न ज़्यादा सजावट, न बनावटी दिखावा — दीवारों पर कुछ framed श्लोक, कोने में छोटा-सी किताबों की अलमारी और घर में फैली हुई एक शांत गरिमा।
“अंतरा बस आती ही होगी। तब तक आप नास्ता लीजिये,”
अंतरा के पापा ने मुस्कराते हुए कहा।
यश के पापा ने औपचारिक-सी मुस्कान के साथ जवाब दिया,
“हमें तो अंतरा पसंद है, पर आज-कल बच्चे पहले आपस में बात करके पसंद करना चाहते हैं। उम्मीद है आपको इससे कोई एतराज़नहीं होगा।”
यह वही वाक्य थे, जो यश ने कुछ दिन पहले घर पर बड़े आत्मविश्वास से समझाए थे। आज उन्हें अपने पापा के मुँह से सुनते हुए उसे थोड़ा अजीब-सा महसूस हुआ।
“हाँ! हाँ! नए ज़माने के साथ थोड़ा तो बदलना ही पड़ता है,”
अंतरा के parents ने सहमति में सिर हिलाया।
यश चुपचाप बैठा सब सुन रहा था। अब तक वह कई लड़कियों को सिर्फ chat के आधार पर reject कर चुका था। इसलिए उसे यहाँ कोई खास उम्मीद नहीं थी।
अधिकतर लड़कियाँ उससे प्रभावित होती थीं | उसके विचारों से नहीं, उसकी popularity से। Influencing की दुनिया का यह कड़वा सच यश बहुत अच्छी तरह जानता था कि आप कभी नहीं समझ पाते कि सामने वाला आपको एक इंसान के रूप में पसंद कर रहा है या एक brand के रूप में।
यही वजह थी कि यश की मम्मी अब काफी परेशान रहने लगी थीं। उन्हें नहीं पता था कि यश मिलने से पहले ही कई रिश्तों को चुपचाप मना कर चुका था। अंतरा को मना करने का भी कोई ठोस कारण उसे अब तक नहीं मिला था।
आज वह यही सोचकर आया था कि मिलकर मना कर देगा। तभी सामने से अंतरा की entry हुई।
यश ने जैसे तस्वीर को चलते-फिरते देख लिया हो।
जैसी वह तस्वीर में थी, बिलकुल वैसी ही सामने खड़ी थी — न heavy makeup, न कोई बनावटी कोशिश।
एक पल को यश के मन में आया —क्या आज भी इतनी simple लड़कियाँ बाक़ी हैं?
वह उसे देखता ही रह गया। Dress में उसने लड़कियों को इतना देख लिया था कि शायद वह भूल ही गया था कि साड़ी में लड़कियाँ कितनी सुन्दर और गरिमामयी लगती हैं।
हल्की-सी मुस्कान के साथ अंतरा ने सबको “जय जिनेन्द्र” कहा और मम्मी के इशारे पर यश के सामने वाले सोफे पर बैठ गई।
“लीजिये, हमारी अंतरा भी आ गयी अब,” घर में जैसे औपचारिकता का एक पड़ाव पूरा हुआ।
“अंतरा बेटा, आप भी कुछ लीजिये हमारे साथ,” यश की मम्मी ने नाश्ते की तरफ इशारा करते हुए कहा।
“नहीं आंटी, मैं अष्टमी और चतुर्दशी को एकासना करती हूँ।”
इस जवाब से यश की मम्मी के चेहरे पर संतोष आ गया, पर यश के मन में एक हल्की-सी आशंका ने जगह बना ली — कहीं शादी के बाद उसे भी एकासना न करनी पड़ जाए।
थोड़ी देर की सामान्य बातचीत के बाद वह क्षण भी आ गया जिसकी औपचारिक प्रतीक्षा थी।
लड़का-लड़की के एकांत में बात करने का।
दोनों को घर की छत पर भेज दिया गया। यह modern समय था, इसलिए किसी और को साथ भेजने की formality नहीं निभाई गयी।
सीढ़ियाँ चढ़ते हुए यश को नहीं पता था कि ऊपर जाने वाला यह रास्ता उसे अपनी ही धारणाओं के सामने खड़ा कर देगा।
Chapter 4
छत पर
छत पर हल्की हवा चल रही थी। नीचे रसोई से चाय की खुशबू आ रही थी, और ऊपर एक असहज-सी चुप्पी।
हमेशा बोलते रहने वाला influencer आज न जाने क्यों शब्दों से खाली था। उसके दिमाग में reels, captions, collaborations — कुछ भी नहीं चल रहा था।
बस एक अजीब-सा प्रश्न, “ये लड़की मेरी दुनिया में फिट कैसे होगी?”
अंतरा ने ही चुप्पी को तोड़ा। उसकी आवाज़ में न घबराहट थी, न बनावटी मिठास।
“आपको यहां आने में कोई तकलीफ तो नहीं हुई?”
यश ने जैसे चौंककर जवाब दिया, “नहींमैसूर,बैंगलोर से इतना भी दूर नहीं है।”
उसने आसमान की तरफ देखा, फिर मोबाइल जेब में टटोला | आदत थी, पर आज निकालने का मन नहीं हुआ।
“Hm…”
अंतरा बस इतना ही बोली।
अब यश भी थोड़ा-सा अपने ख़्यालों से बाहर आया। उसे लगा – चलो, formalities पूरी कर लेते हैं।
उसने वही सवाल किया,जो वह हर लड़की से करता आया था….एक tested, safe सवाल।
“What are your hobbies?”
अंतरा ने बिना झिझक जवाब दिया, “आपने शायद मेरा biodata नहीं देखा। मुझे books पढ़ना और painting करना पसंद है। और आपकी hobbies?”
यश के मन में एक हल्की-सी हँसी उभरी….ये कैसी बात है?
पूरी दुनिया उसे reels से जानती थी। उसके million views,videos, recognition….सब तो public था।
“मुझे खाना बनाना पसंद है। मैं बहुत अच्छी रोटी बना लेता हूँ।”
उसने हँसते हुए कह दिया। मगर अंतरा नहीं हँसी।
वह उसे ध्यान से देख रही थी| जैसे शब्दों के पीछे का भाव समझने की कोशिश कर रही हो।
“आप हंस क्यों रहे हैं? खाना बनाना funny काम है क्या?”
उसकी गंभीर आवाज़ ने यश को जैसे जमीन पर ला पटका।
“तुम्हे सच में नहीं पता की मैं कौन हूँ???”
अंतरा ने स्वाभाविक-सा उत्तर दिया —
“आप यश हैं। Bangalore में software engineer की job करते हैं। बताया था मम्मी ने।”
यश कुछ क्षण चुप रहा। पहली बार उसे किसी ने पहचानने से इनकार कर दिया था।
“आप social media पर हैं क्या?” उसने जानबूझकर पूछा।
“जी नहीं।”
“But who isn’t on social media in today’s generation???”
“Me.”
उस एक शब्द में न rebellion था, न superiority….बस स्पष्टता।
“But why??!!”
“Because I think it is a waste of my valuable time. It rots one’s brain. I have taken an oath of not using social media unless for work.”
Brain rot.
Waste of time.
ये शब्द यश के दिमाग में गूंजते रहे। उसकी पूरी पहचान…उसका passion, उसका purpose…जैसे किसी ने कटघरे में खड़ा कर दिया हो।
उसने खुद को संभालते हुए कहा –
“मेरे विचार से अगर कोई धर्म की प्रभावना करेगा तो उसे social media पर आना पड़ेगा। आज कल large audience तक पहुंचने का यही माध्यम है।”
अंतरा ने पलटकर तुरंत जवाब नहीं दिया। उसने पहले सांस ली….जैसे शब्द तौल रही हो।
“मुझे लगता है social media से प्रभावना कम और अप्रभावना ज्यादा होती है। और आराधना के मार्ग में प्रभावना सहज हो जाती है। दिखावा करके प्रभावना नहीं होती।”
यश के अंदर कुछ टूट-सा गया।
“तुम्हे social media सिर्फ एक दिखावा लगता है?!”
“नहीं है क्या?.. दिखाना है तो अपने failures को भी दिखाओ। कमियों को छुपाना और थोड़े से गुणों को बढ़ा-चढ़ा कर सुन्दर तरीके से दिखाना…ये ही तो करते है सब social media पर।”
अब यश के स्वर में तीखापन आ गया था। पहली बार कोई उसकी दुनिया पर इतनी साफ उँगली रख रहा था।
“तो फिर तुम्हारे हिसाब से प्रभावना कैसे होती है?”
अंतरा ने नजरें झुकाईं, फिर शांति से बोली –
“आराधक ही प्रभावक है। हमारे ज्ञान-ध्यान-आचरण से ही लोग प्रभावित होते हैं। ज्ञानियों को ही देख लो …उनके ज्ञान की महिमा आज भी गायी जाती है। जैनों के लिए तो उनका बाहरी आचरण ही प्रभावना कर देता है।”
यश अब कुछ नहीं बोलना चाहता था। पहली बार उसे किसी ने celebrity नहीं, साधक बनने की याद दिलाई थी।
अंतरा भी समझ गई थी…कुछ बातें समझाई नहीं जातीं, उन्हें समय पर छोड़ देना ही बेहतर होता है।
तभी नीचे से आवाज आई| दोनों ने एक साथ चैन की सांस ली।
उस पल, दोनों को साफ समझ आ गया था ….यह रिश्ता हाँ या ना का नहीं, दो अलग रास्तों का था।
क्या यश और अंतरा दुबारा एक-दूसरे से मिलेंगे या उनकी कहानी हो जाएगी यहीं खत्म ? जानने के लिए पढ़िए अगला पार्ट !


