Chapter 7
एक हफ्ते बाद
अंतरा कुछ काम से अपनी दीदी के यहाँ बैंगलोर आई थी। दीदी शहर के उस हिस्से में रहती थीं जहाँ अब भी पुराने बैंगलोर की झलक मिल जाती थी। उन्हीं के घर के पास एक पुराना जिनमंदिर था — साधारण, शांत और समय से थोड़ा अलग-सा।
उस मंदिर की एक छोटी-सी लाइब्रेरी थी, जहाँ बहुत-सी पुरानी जिनवाणी सुरक्षित रखी गई थीं। कुछ ग्रंथ ऐसे भी थे जिनका प्रकाशन अब बंद हो चुका था। अंतरा इन दिनों एक नए विषय पर शोध कर रही थी, और उसे पूरा विश्वास था कि जिन संदर्भों की उसे तलाश है, उनमें से कुछ यहीं मिल सकते हैं।
दर्शन और पूजन के बाद वह सीधे लाइब्रेरी की ओर चली गई। अलमारियों में सजी किताबों के बीच वह एक-एक करके जिनवाणी देखने लगी। तभी उसकी नज़र एक बहुत पुरानी जिनवाणी पर ठहर गई। जिल्द घिस चुकी थी, पन्ने पीले पड़ गए थे, पर विषयवस्तु देखकर उसे तुरंत समझ आ गया कि इसमें उसके काम का काफ़ी material है।
मंदिर अब लगभग खाली हो चुका था। अंतरा जानबूझकर ऐसे समय मंदिर आती थी जब लोग कम हों। भीड़ से वह हमेशा बचती आई थी। भगवान के साथ अकेले बैठकर मन की बातें करना उसे सबसे अधिक प्रिय लगता था।
वह उस जिनवाणी को लेकर लाइब्रेरी के एक कोने में बैठ गई। पढ़ते-पढ़ते वह अपने काम के बिंदु नोट करने लगी। कभी किसी पंक्ति पर देर तक ठहर जाती, तो कभी लगातार कई पन्ने पलट देती।
करीब एक घंटा बीत चुका था। मंदिर बंद होने में अभी कुछ समय था, इसलिए उसने पढ़ना-लिखना जारी रखा। वह किताबों में इस तरह खो जाती थी कि समय का ध्यान ही नहीं रहता था।
उसी तन्मयता के बीच पीछे से एक आवाज़ आई।
“ये है इस मंदिर की library जो आप मेरे पीछे देख सकते हैं। यहाँ आपको जिनवाणी पढ़ने मिलेगी। यहीं पर मैं बचपन में पाठशाला पढ़ा करता था।”
आवाज़ स्पष्ट थी, जैसे किसी कैमरे से बात की जा रही हो।
अंतरा का ध्यान एकदम टूट गया। उसकी शांति भंग हो चुकी थी। वह पलटी यह देखने के लिए कि कौन उसकी एकांत की दुनिया में अचानक आ गया है।
और पलटते ही… उसकी आँखें ठहर गईं। जो सामने था, उसे देखकर उसे अपनी ही आँखों पर विश्वास नहीं हुआ।
उसी क्षण पीछे आए व्यक्ति ने भी कैमरे के फ्रेम में आई अंतरा को देख लिया। उसके शब्द अचानक रुक गए। आवाज़ जैसे बीच में ही खो गई हो।
दोनों कुछ क्षण एक-दूसरे को देखते रहे। बिना कुछ कहे, बिना कुछ पूछे। दोनों की नज़रों में एक ही प्रश्न उभरा —“तुम…?”
यह कोई इत्तेफ़ाक था या किसी अनदेखी योजना का हिस्सा– समझ पाना मुश्किल था।
अंतरा कुछ बोल पाती, उससे पहले ही वह व्यक्ति मुड़ा और बिना कुछ कहे वहाँ से चला गया। लाइब्रेरी फिर से शांत हो गई। लेकिन वह शांति अब पहले जैसी नहीं थी।
अंतरा जानती थी कि अब वह पढ़ नहीं पाएगी। उसका ध्यान पूरी तरह भंग हो चुका था। उसने जिनवाणी को सावधानी से उसकी जगह पर विराजमान किया और वहाँ से निकलना ही ठीक समझा।
कुछ मुलाक़ातें शब्दों के बिना भी बहुत कुछ कह जाती हैं।
Chapter 8
अगले दिन
अंतरा ने तय किया कि आज वह मंदिर थोड़ा जल्दी चली जाएगी। रविवार थाऔर रविवार उसके लिए केवल अवकाश का दिन नहीं होता था। यह वही दिन था जब वह खुद को लोगों के बीच रखने की कोशिश करती थी।
मम्मी की यही इच्छा थी कि उनकी बेटी घर में नीरस न बैठे, इसलिए उसने उनसे हर रविवार सामूहिक पूजन में बैठने का वादा कर रखा था।
आज वह अभिषेक देखने के लिए पहले ही निकल पड़ी। मंदिर के प्रांगण में पहुँचकर उसने हाथ-पैर धोए और मन ही मन निस्सही बोलते हुए भीतर प्रवेश किया। दुपट्टे से उसने सिर ढक लिया था। उसका साफ़, सादा सफेद सूट जैसे यह कह रहा हो कि मंदिर में आने से पहले वह अपने मन का मैल बाहर ही धो आई है।
जब अंतरा मंदिर में प्रवेश करती थी, तो उसका ध्यान केवल एक ही दिशा में होता था — भगवान की प्रतिमा।
आसपास क्या चल रहा है, कौन आया, कौन गया — इन सबसे उसका मन अनछुआ ही रहता था।
सफेद पाषाण की प्रतिमा के सामने सफेद वस्त्रों में खड़ी अंतरा ऐसी प्रतीत हो रही थी मानो किसी ने बीच में आईना रख दिया हो। एक क्षण को ऐसा लगा जैसे वह सिद्ध समान स्वयं को अनुभव करते-करते बस अभी उस आईने के उस पार पहुँच जाएगी।
अंतरा अभिषेक शुरू होने से पहले ही आ चुकी थी। समय का पालन उसकी आदत नहीं, स्वभाव था। परीक्षा हो या यात्रा — वह कभी देर से नहीं पहुँची थी। न कोई बस छूटी, न कोई ट्रेन। आज भी वह अपने स्वभाव के अनुसार सबसे पहले पहुँची थी।
अभिषेक अब समाप्ति की ओर बढ़ रहा था, तभी एक व्यक्ति धोती-दुपट्टे में थोड़ा हाँफता हुआ भीतर आया। अभिषेक कर रहे लोगों ने उसे धीमे स्वर में समझाया —
“जल्दी आया करो भाई। ये जिनमंदिर है, यहाँ सबको same treatment मिलता है।”
उसने सिर हिलाकर सहमति जताई और हल्की आवाज़ में sorry कहा।
अंतरा उस समय अभिषेक के पाठ में इतनी मग्न थी कि उसने उसे देखा ही नहीं। शब्द, स्वर और भाव — सब में वह पूरी तरह डूबी हुई थी।
जब अभिषेक पूर्ण हुआ और गंधोदक बाँटना शुरू हुआ, तभी उस व्यक्ति ने अंतरा के सामने आकर हाथ बढ़ाया।
उस क्षण अंतरा की दृष्टि उठी।
ये क्या…
ये तो वही कल वाला लड़का है।
ये यहाँ क्या कर रहा है?
लड़के के मन में भी शायद वही प्रश्न उमड़ रहे थे। पर बड़ों की उपस्थिति में दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला। न दृष्टि रुकी, न शब्द निकले।
अंतरा ने गंधोदक लिया। वह व्यक्ति आगे बढ़ गया।
उस एक पल में कई प्रश्न अनकहे रह गए।
इसके बाद सब कुछ सामूहिक रूप से होता चला गया। पूजन के बाद स्वाध्याय हुआ। श्लोकों और अर्थों के बीच अंतरा का मन बार-बार किसी और दिशा में भटकने लगता, पर उसने स्वयं को वहीं बाँधे रखा।
स्वाध्याय समाप्त होते ही वह बिना किसी से बात किए सीधे घर लौट आई।
कुछ मुलाक़ातें उत्तर नहीं माँगतीं, वे बस मन में एक हल्की-सी हलचल छोड़ जाती हैं। और आज अंतरा के साथ यही हुआ था।
Chapter 9
घर पर आज लंच नहीं था। आज लंच एक साधर्मी के यहाँ था।
दीदी ने साधर्मी की कोई खास detail अंतरा को नहीं बताई थी। बस इतना कहा था कि आज सभी लोग वहीं इकट्ठा होंगे।
अंतरा थोड़ी संकोच में थी। भीड़ उसे वैसे भी असहज कर देती थी, और बिना जाने-पहचाने किसी के घर जाना उसके स्वभाव में नहीं था।
पर दीदी ने तसल्ली दी थी कि उसे भी आने के लिए खास निमंत्रण दिया गया है। और दीदी से कौन बहस करे —यह सोचकर अंतरा तैयार हो गई।
साधर्मी का घर बहुत दूर नहीं था। बैंगलोर में आमतौर पर रिश्तेदारों या पहचान वालों के घर काफी दूर पड़ते हैं, परन्तु कुछ जैन परिवार ऐसे भी थे जो वर्षों से मंदिर के आसपास ही रहते आए थे। ये सभी साधर्मी धीरे-धीरे एक परिवार जैसे बन गए थे — सुख-दुःख में साथ, और हर महीने एक दिन किसी एक के घर सब मिलकर लंच किया करते थे।
आज उसी साधर्मी का नंबर था, जिसके घर अंतरा जा रही थी।
घर पहुँचते ही अंतरा ने महसूस किया कि काफी लोग पहले से आ चुके थे। घर में चहल-पहल थी, आवाज़ें, हँसी और रसोई से आती खुशबू — सब मिलकर माहौल को जीवंत बना रहे थे।
अंतरा किसी को नहीं जानती थी, इसलिए उसने दीदी के साथ ही रहना ठीक समझा। पर दीदी तो सबको जानती थीं। थोड़ी ही देर में वह किसी और से बात करने चली गईं और अंतरा वहीं अकेली खड़ी रह गई।
अब उसके पास कोई काम नहीं था। उसने आसपास देखना शुरू किया।
दीवार पर कुछ धार्मिक quotes framed थे। एक जगह पाँच परमेष्ठी का चित्र लगा था। दूसरी ओर माता के सोलह स्वप्नों का सुंदर चित्रण था। एक कोने में कुछ कलश रखे थे — ऐसे कलश जो आमतौर पर पंचकल्याणकों से लाए जाते हैं।
कुल मिलाकर घर को देखकर यह साफ़ समझ में आ रहा था कि यह किसी जैन का ही घर है। Modern look के साथ traditional values का मेल अंतरा को अच्छा लग रहा था।
वह अभी यह सब देख ही रही थी कि उसकी नज़र सामने से आते हुए एक व्यक्ति पर पड़ी।
अब तो हद हो चुकी थी।
ये लड़का उसका पीछा करते-करते यहाँ तक आ गया है!
अंतरा के मन में पहली ही प्रतिक्रिया यही थी।
“तुम क्या कर रही हो यहाँ?”
उसकी आवाज़ में हैरानी भी थी और चिढ़ भी।
“ये सवाल मैं तुमसे पूछ सकती हूँ,” अंतरा ने तुरंत पलटकर कहा।
“तुम क्या कर रहे हो यहाँ? मेरा पीछा करने से मन नहीं भरा क्या?”
“मैं पीछा कर रहा हूँ?!” वह तैश में आ गया। “तुम हो जो मेरे घर तक आ गई हो।”
“घर…?” अंतरा का स्वर अचानक बदल गया।
“हाँ,” उसने सख़्ती से कहा।
“ये मेरा घर है। कल तुम्हें मंदिर में देखा तो लगा शायद coincidence होगा। पर आज मुझे यक़ीन हो गया है कि तुम मेरा पीछा कर रही हो। तुम भी बाक़ी लड़कियों जैसी ही निकली।”
“क्या मतलब है तुम्हारा?” अंतरा का चेहरा तमतमा गया।
“अच्छा लड़का देखा नहीं कि आ गईं फँसाने।”
“कहाँ है अच्छा लड़का?”,अंतरा ने बिना रुके कहा।
“मुझे तो नहीं दिख रहा। घर में आईना तो होगा ही — देख लेना।”
बहस अब और बढ़ सकती थी, पर तभी दीदी वहाँ आ गईं।
उन्होंने दोनों को बात करते देख लिया था।
“यश! कैसे हो?” दीदी मुस्कराईं।
“तो तुम मिल लिए मेरी बहन से दुबारा!”
“ये आपकी बहन है?!” यश एक पल के लिए समझ ही नहीं पाया कि क्या प्रतिक्रिया दे।
उसने वहां से जाने का बहाना बनाया|
“अच्छा,” उसने औपचारिक-सा कहा।
“मैं देखकर आता हूँ कि मम्मी को कुछ help तो नहीं चाहिए।”
यश के जाते ही अंतरा दीदी पर बरस पड़ी।
“आपने मुझे बताया क्यों नहीं कि वो साधर्मी कौन हैं?”
“बताती तो तुम आती ही नहीं,” दीदी ने शांति से कहा।
“यश की मम्मी ने मुझसे कहा था कि एक साधर्मी होने के नाते तुम्हें invite करना उनका हक़ है। इसलिए मैं मना भी नहीं कर पाई।”
फिर उन्होंने बात को हल्का बनाते हुए थोड़ा धीमे स्वर में पूछा —
“वैसे… क्या बातें हो रही थीं दोनों में?”
“बातें?!” अंतरा ने आँखें घुमा दीं।
“ये समझ लो कि युद्ध होने को था। आप आ गईं, इसलिए बच गए। आगे से कभी ऐसा मत करना मेरे साथ, वरना भूल जाना कि मैं आपके साथ कहीं आऊँगी।”
“अच्छा बाबा, sorry”, दीदी ने मुस्कराते हुए कहा।
“अब आ ही गई हो तो लंच कर लो। ऐसे ही चली जाओगी तो आंटी को बुरा लग जाएगा। और फिर तुम और मैं तो खिचड़ी खा लेंगे, पर तुम्हारे जीजू के लिए सब्ज़ी-रोटी कौन बनाएगा?”
दोनों हँस पड़ीं।
थोड़ी देर बाद सब लोग भोजन करने बैठ गए। अंतरा ने देखा कि यश सबको भोजन serve कर रहा था। उसने भी यश के मम्मी-पापा से कुशल-क्षेम पूछी।
आज वह एक साधर्मी के घर आई थी।
भोजन समाप्त होते ही सब लोग धीरे-धीरे अपने-अपने घर लौट गए।
क्या यश और अंतरा की इस तकरार के बाद भी हो सकता है प्यार? जानने के लिए पढ़िए अगला पार्ट !




