यश की अंतरात्मा – Part 3

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Chapter 5

सबके जाने के बाद घर में एक अजीब-सी शांति फैल गई थी।
औपचारिक मुस्कानें, चाय के कप और बातचीत की आवाज़ें जैसे दरवाज़े के साथ ही बाहर चली गई हों।
अंतरा अपने कमरे में आई, खिड़की के पास खड़ी हुई और कुछ पल यूँ ही बाहर देखती रही। फिर उसने मोबाइल उठाया।

दीदी को call करना उसे जरूरी लग रहा था। दीदी बैंगलोर में रहती थीं, और यश के बारे में सबसे पहले वही जानती थीं। उनके ससुराल में किसी दूर के रिश्तेदार ने यश का नाम लिया था, और तभी से दीदी उत्साहित थीं।
उन्होंने साफ कह दिया था — decision सबसे पहले मुझे बताना।

“Hello दीदी!”

“बताओ फिर, कैसा लगा यश तुम्हें? Handsome है ना!”

अंतरा ने हल्की-सी साँस छोड़ी।
“Handsome का पता नहीं। Weird ज़रूर लगा।”

“क्यों? क्या बात हुई दोनों की?”

“पता नहीं…पूछ रहा था कि social media पर हो क्या, और मुझे जानती हो क्या। भला ये कैसा सवाल हुआ कि मुझे जानती हो कि मैं कौन हूँ? अंत में तो ऐसा लग रहा था कि बहस हो जाएगी हमारी, वो तो मम्मी ने बुला लिया।”

फोन के उस तरफ़ कुछ पल की चुप्पी रही, फिर दीदी की आवाज़ आई —
“अरे पागल! मैं भूल ही गई तुझे बताना। यश social media का star है।”

अंतरा चौंक गयी, “Star?? मतलब…?”

“यश Jain influencer है। उसके 1 million followers हैं।”

“जैन influencer क्या बला है अब?” उसके स्वर में न ताना था, न मज़ाक…सिर्फ़ अज्ञान।

“ओ मेरी social media अनपढ़ बहन!” दीदी हँस पड़ीं।
“वो जैन धर्म की प्रभावना के वीडियो बनाता है। अब तक कितने ही मंदिरों के वीडियो बना चुका है।”

“अच्छा…”

अंतरा कुछ देर सोचती रही।
“तभी वह पूछ रहा था कि प्रभावना कैसे होगी।…मैंने तो social media को…..”

“तूने फिर से ‘social media waste है’ वाला lecture तो नहीं शुरू कर दिया था??”

“थोड़ा-सा …”
अंतरा ने रुकते हुए कहा।
“I mean… मैंने तो बस कुछ facts ही state किए थे।”

“हो गया सत्यानाश…!”

“दीदी!!….”

“अंतरा, सुन। यश को बहुत लड़कियाँ मिल जाएँगी। जैन समाज में उसे हर कोई जानता है। पर तुझे कौन मिलेगा? तेरे तो दोस्त भी नहीं बचे, जबसे तूने खुद को पूरी तरह किताबी कीड़ा बना लिया है।”

अंतरा के भीतर कुछ कस गया। फिर भी उसने संयम के साथ कहा।

“आप किसकी side हो दीदी? …..न मिले तो न सही। मुझे कौन-सी पूर्णता के लिए शादी की ज़रूरत है? और होगा वो कहीं का राजकुमार… मरती होंगी लड़कियाँ उस पर, पर मुझे तो एकदम अजीब प्राणी लगा। उसकी और मेरी तो सात जन्म में भी न बन पाएगी।”

“इसलिए कहती हूँ,” दीदी का स्वर अब थोड़ा सख़्त हो गया था,
“किताबों में कम और बाहर की दुनिया में ज़्यादा ध्यान दिया कर। वरना अकेली ही रह जाएगी।”

अब अंतरा सचमुच चिढ़ चुकी थी। वह जानती थी कि इसके बाद दीदी उसकी किताबों, एकांत और आदतों पर लंबा भाषण देंगी। उसने जल्दी से कहा कि मम्मी बुला रही हैं और किसी तरह फोन काट दिया।

कमरे में फिर सन्नाटा लौट आया।

रात गहरी हो चुकी थी। अंतरा ने रोज़ की तरह पाँच परमेष्ठी का ध्यान किया और बिस्तर पर लेट गई। पर आज नींद उसकी आँखों से दूर थी।

मन में विचारों की एक लंबी शृंखला चल रही थी।

क्या सच में मैं दुनिया से अलग कट चुकी हूँ?
क्या अब मेरे कोई दोस्त भी नहीं बचे?
कहीं दीदी सही तो नहीं कह रहीं कि मैं अकेली रह जाऊँगी…

पर एकांत तो मुझे प्रिय लगता है।
इसी में मुझे लिखने और सोचने की आज़ादी मिलती है।
आख़िर एकत्व में ही तो सौंदर्य है।

शादी को लोग पूरक क्यों मानते हैं?
क्या दो दुखी मिलकर सुखी हो सकते हैं?
जब आत्मा पूर्ण ही है तो फिर हमें दूसरे की आस क्यों है?

कुछ पल बाद उसने खुद को और ईमानदारी से देखा।

वो तो मेरी इतनी स्थिरता नहीं है
कि मैं ब्रह्मचर्य ले सकूँ और अकेले रह सकूँ।
इसीलिए विवाह का विकल्प आया है।

विवाह के लिए मैं ऐसा ही लड़का चुनूँगी जो धर्म को सर्वोपरि रखे।
मुझे रूप-रंग और धन-दौलत से कोई मतलब नहीं।
रूप-रंग नामकर्म के उदय से मिलता है और धन पुण्य से।
इन पैमानों पर किसी को तौलना मुझे स्वीकार नहीं।

ऐसा घर जहाँ मेरे धर्म का पालन हो — वही घर है।
और ऐसा साथी जो धर्म में मेरा साथ दे — वही मेरा अपना।

इन विचारों के बीच कब उसकी आँख लग गई, उसे पता ही नहीं चला। अंतरा गहरी नींद में चली गई — बिलकुल शांत, जैसे मन ने अपना उत्तर पा लिया हो।


Chapter 6

अंतरा के घर से निकलने के बाद सब लोग कार में बैठे ही थे कि यश की मम्मी से रहा नहीं गया। दिन भर की शालीनता और औपचारिकता जैसे एक ही वाक्य में बाहर आ गई।

“मुझे तो अंतरा बहुत पसंद आई,” उन्होंने पूरे विश्वास से कहा।
“कितनी शांत और धार्मिक लड़की है। ये हमारे घर में आएगी तो घर स्वर्ग बन जाएगा। क्यों यश, तुम्हारा क्या ख़याल है?”

यश कुछ नहीं बोला। वह बोलना नहीं चाहता था। उसके भीतर एक अजीब-सा गुस्सा उमड़ रहा था| अंतरा पर नहीं, पर उस एहसास पर जो उसने भीतर जगा दिया था। उसके पूरे passion की जैसे band बजा दी थी अंतरा ने।

“अरे बोलो भैया!” पीछे से छोटे भाई की आवाज़ आई। “क्या अभी से भाभी के ख़यालों में खोए हो?”

“तू चुप कर!” यश झल्ला उठा। “छोटा है, छोटा ही रह। बड़ों के बीच में मत बोला कर।”

“देखो पापा!” भाई ने तुरंत शिकायत की। “भैया मुझे फालतू ही डांटते रहते हैं।”

तभी यश के पापा बोले। वह आमतौर पर कम बोलते थे, पर यह मामला उनके बेटे की ज़िंदगी का था।

“यश बेटा,” उनकी आवाज़ में गंभीरता थी, “तुम्हारा जवाब ही हमारे लिए मान्य होगा। इससे कोई फ़र्कनहीं पड़ता कि मुझे या तुम्हारी मम्मी को अंतरा कैसी लगी। तुम्हें जिसके साथ life गुज़ारनी है, उसे तुम ही choose करोगे। मम्मी तो बस तुम्हारा decision जानना चाहती हैं।”

यश ने गहरी साँस ली।

“पापा… मम्मी…” उसने थोड़ा रुककर कहा,
“मैं इस रिश्ते के बारे में कोई decision देने से पहले थोड़ा समय लेना चाहूँगा। तब तक आप please अंतरा या किसी और लड़की की बात मुझसे मत कीजिएगा।”

कार में कुछ पल के लिए शांति छा गई।

“ठीक है बेटा,” मम्मी ने आखिरकार कहा।

और इसी के साथ अंतरा-पुराण, कार की चर्चा से अस्थायी रूप से स्थगित कर दिया गया।

 

यश बात करना चाहता था, पर घरवालों से नहीं।

बैंगलोर पहुँचते ही वह सीधे अपने सबसे प्रिय मित्र पियूष से मिलने कैफ़े चला गया। वैसे वह call या chat पर भी सब बता सकता था, पर ऐसा कौन होता है जो अपने bestie से मिलने के लिए बहाना न ढूँढे।

“और बताओ,” पियूष ने मुस्कराते हुए पूछा,“कैसी लगी Miss Invisible?”

“Opinionated,” यश ने बिना सोचे जवाब दिया।
“उसे तो पता ही नहीं था कि मैं कौन हूँ। मुझे आज तक लगता था कि दुनिया मुझे जानती है, पर उसने तो मुझे गलत साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।”

पियूष हँस पड़ा।

“Mr. Famous को किसी लड़की ने पहचानने से मना कर दिया!” उसने sarcastically कहा।
“ये कैसे हो गया? देखो कहीं attitude को चोट तो नहीं आई?”

“उसे लगता है social media waste of time है,” यश ने नाराज़गी के साथ कहा। “और ये brain rot करता है।”

“वैसे क्या गलत कहा उसने?” पियूष ने सहजता से जवाब दिया।
“Normally तो लोग वाकई time waste ही कर रहे हैं। Reels से brain rot होता है | ये prove भी हो चुका है। उसे नहीं पता था ना कि तुम mostly काम के लिए social media use करते हो।”

“चलो,” यश ने थोड़ा झुँझलाते हुए कहा,
“ये बात मान ली तुम्हारी। पर उसे लगता है कि इसके बिना भी प्रभावना हो सकती है। मैं जब तक लोगों को बताऊँगा नहीं, तब तक उन्हें कैसे पता चलेगा कि जैन धर्म क्या है?”

पियूष ने कुर्सी से टिकते हुए कहा —
“वो क्या कहते हैं उन्हें जिन्हें आप लोग आजकल बहुत कम छूते हैं…”
फिर खुद ही बोला, “हाँ….. किताबें और जिनवाणी। आज से कुछ साल पहले तक वही लोगों को बता रही थीं कि धर्म क्या है। साहब, आप नहीं पढ़ते इसका मतलब ये नहीं कि कोई नहीं पढ़ता।”

यश ने आँखें सिकोड़ लीं।

“भाई, तुम मेरे bestie हो या उसके?”

उसने आधा मज़ाक, आधा गंभीरता से कहा।
“कहीं तुम्हें ही तो वो पसंद नहीं आ गई?”

फिर खुद ही आगे बढ़ गया —
“एक काम करता हूँ, मम्मी को बोल देता हूँ पियूष को पसंद है लड़की। उसी की शादी करवा दो।”

“जूते पड़वाओगे क्या?” पियूष हँसते-हँसते बोला।
“मेरी बीवी घर पर मेरा इंतज़ार कर रही है। अगर उसे पता लग गया कि मेरा प्रिय दोस्त ऐसी बेतुकी बातें करता है तो दोनों को hospital पहुँचा देगी। मज़ाक में भी ऐसी बातें मत किया करो।”

“अच्छा, sorry,” यश ने हाथ उठाकर कहा।
“अब नहीं करूँगा।” फिर उसका स्वर धीमा पड़ गया।

“मेरा तो यार शादी से मन-सा उठ रहा है। कोई अच्छी लड़की अब इस दुनिया में बची ही नहीं है। कुँवारा बैठना गलत लड़की से शादी करने से ज़्यादा better है…”

पियूष ने उसे देखा,फिर शांत स्वर में बोला —

“मिलेगी भाई। सब्र रखो। कोई तो लड़की होगी जो तुम्हारे प्रभावना के काम को support करेगी और तुम्हें समझेगी।”

यश ने हल्की मुस्कान के साथ कहा —

“हाँ यार… उम्मीद पर ही दुनिया कायम है।”

फिर उठते हुए बोला, “चलो, मिलते हैं। See ya…”

दोनों अपने-अपने घर चले गए।

और यश के भीतर पहली बार सिर्फ़ सवाल ही नहीं, थोड़ा-सा संदेह भी घर कर गया।


क्या अंतरा को ऐसा लड़का मिलेगा ? क्या यश की उम्मीदों पर कोई लड़की खरी उतरेगी? जानने के लिए पढ़िए अगला पार्ट !

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