गुरुदेवश्री उपकार दिवस विशेष

गुरुदेवश्री का आत्मा अलौकिक था | उन्होंने जो उपकार हम पर किया है, उसका ऋण तो हम कभी नहीं चुका सकते | पर हम उनकी वाणी को समझकर आत्मा को समझे तो उस उपकार का कुछ अंश शायद कम हो जाए |

वैसे तो गुरुदेवश्री का पूरा जीवन ही प्रेरणादायक है | पर मैं यहाँ कुछ विशेष बिंदु बताने का प्रयास कर रही हूँ जो हम अपने जीवन में उतार सकते हैं –

  • जिज्ञासु बनो : गुरुदेवश्री में सत्य को जानने की और मार्ग खोजने की जिज्ञासा थी | उसी जिज्ञासा के कारण उन्होंने दिगंबर धर्म के ग्रन्थ ‘समयसार’ को पढ़ा | अगर हम भी सच्चा मार्ग खोजने और आत्मा को जानने की जिज्ञासा बनाये रखें, तो हमे आत्म अनुभव अवश्य होगा |
  • साधनो के मोहताज मत बनो :  जब गुरुदेवश्री का विरोध हुआ था और वो स्टार ऑफ़ इंडिया में आकर रहने लगे थे, तब उनके पास किसी भी प्रकार के अनुकूलता के साधन नहीं थे| ऐसे समय में भी गुरुदेवश्री ने साधनो को जुटाने का और उनकी राह देखने का प्रयास न करते हुए अपने आत्मा का अभ्यास किया | आज हमारे पास इतने साधन होने पर भी अगर हम शिकायत करते हैं, तो फिर हम उन गुरुदेवश्री को नहीं मानते |
  • परीक्षा प्रधानी बनो : अगर गुरुदेवश्री ने श्वेतांवर ग्रंथो की परीक्षा न की होती तो उन्हें सच्चे धर्म का पता कैसे लगता ? जैन धर्म तो परीक्षा प्रधान है | जिस बात को हम परीक्षा करके मानते हैं, वो बात जीवन भर के लिए अंदर बैठ जाती है |
  • स्वाध्यायी बनो : जिनके मात्र एक शास्त्र पर 19 बार प्रवचन हो, हज़ारो सी.डी. प्रवचन हो, ऐसे पूज्य गुरुदेवश्री का स्वाध्याय कितना होगा ! ये उनके स्वाध्याय का ही प्रभाव है जो उन्हें लाखों लोग एक साथ सुना करते थे | स्वाध्याय तो हर श्रावक का आवश्यक है |
  • एक पक्ष मत पकड़ो : गुरुदेवश्री के जीवन में निश्चय और व्यव्हार का सुमेल था | जितना वे अपने ज्ञान-ध्यान में लीन रहते थे, उतना ही वो व्यव्हार की क्रियाओ का भी ध्यान रखते थे | हमारे जीवन में स्वाध्याय और बाहर की क्रियाओं (कंदमूल नहीं खाना आदि ) का ऐसा ही सुमेल होना चाहिए | अगर आप सिर्फ स्वाध्याय करते हो और डोमिनोज़ का पिज़्ज़ा खाते हो, तो आपका स्वाध्याय व्यर्थ है |
  • आशा मत रखो : जब गुरुदेवश्री ने श्वेताम्बर मत छोड़ा था, तब उन्होंने ये आशा नहीं की थी की दिगंबर धर्म वाले उन्हें अपना कर उनकी सेवा करेंगे | हमे भी आशा नहीं रखना चाहिए की सब हमे समझेंगे और हमारे अनुसार चलेंगे | क्यूंकि हर द्रव्य का परिणमन स्वतंत्र है |
  • सरल स्वभावी बनो : ये शिक्षा तो आप स्वयं ही गुरुदेवश्री के जीवन से ले सकते हैं |

गुरुदेवश्री के गुणों का बखान मैं अल्पबुद्धि करने में समर्थ नहीं हूँ | फिर भी ऊपर के बिन्दुओ में मुझसे कोई भूल हुई हो तो मुझे जरूर सुधारें | त्रुटियां ठीक करने के लिए सुलभ भैया को धन्यवाद |

प्रस्तुत हैं कुछ भक्ति पूज्य गुरुदेवश्री के जन्म दिवस के उपलक्ष्य में :

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