कर्मो का फल

A-हाय राम ! मेरे तो कर्म फूट गए |

B- अरे बहन, क्या हुआ ? तुम रो क्यों रही हो ?

A-अब क्या बताऊ बहन, इनको व्यापार में बहुत घाटा हुआ है | अब तो हमारे दाल-रोटी खाने के भी लाले हैं |

B-रोना बंद करो | रोने से कुछ नहीं होगा |

A- रोऊ नहीं तो क्या करूं ? मेरी चिंता नहीं है पर बच्चो को अब अच्छे स्कूल में कैसे पढ़ाएंगे ? उनके भविष्य का क्या होगा ? न जाने पिछले जन्म में कौनसे खोटे कर्म किये थे जो ये दिन देखने पड रहे हैं |

B-तुम पहले रो-रोकर कर्मो को दोष देना बंद करो | सोचो की यदि ये तुम्हारे पूर्व कर्मो का फल है, तो जो तुम ये आर्त ध्यान करके नए कर्म बांध रही हो उनका भविष्य में क्या फल होगा ? कहा भी है बंध समय जीव चेतो रे, उदय समय क्या चिंत ?

A-ये सब धर्म की बाते तो मैंने भी खूब पढ़ीं हैं, पर इनसे कुछ नहीं होता जिस पर बीतती है वो ही जानता है | चलो मैं रोना बंद भी कर दूँ पर घर के हालात और बच्चो के भविष्य का क्या होगा ?

B- तुम्हारे रोने से तो हालात वैसे भी ठीक नहीं होने वाले | देखो बहन,समय-समय की बात है | आज तुम्हारा पाप का उदय चल रहा है, तो कल पुण्य का भी होगा | तुम्हें दोनों समय में समता धारण करनी चाहिए | धर्मात्मा जीव पाप के उदय में विषाद और पुण्य के उदय में हर्ष नहीं मानते | घर के हालात तो ठीक हो ही जायेंगे, आज नहीं तो कल | तुम शोक मत करो |

A- और बच्चे ? उनका क्या होगा? उनकी पढ़ाई का क्या होगा ? मुझे मेरी चिंता नहीं है | पर बच्चो का भविष्य नहीं बिगड़ना चाहिए |

B- तुम व्यर्थ ही चिंता कर रही हो | सब जीवो का परिणमन स्वतंत्र है | सब अपने अपने कर्मो का फल भोगते हैं | बच्चो का पुण्य का उदय होगा तो उन्हें अच्छी शिक्षा मिले बिना नहीं रहेगी | पर तुम्हारा काम है उन्हें जैन धर्म के संस्कार देना, पाठशाला भेजना |

A-हाँ बहन तुमने सत्य कहा | असाता के उदय में जिनवाणी के वचन और तुम्हारी जैसी मित्र ही काम आती है |

B- अब तुम धैर्य धारण करो और परिवार के अन्य सदस्यों को भी शांत भाव रखने को कहो | कभी कोई सहायता की जरूरत हो तो बिना संकोच के मुझे बताना। अब मैं चलती हूँ।

A- ठीक है बहन। जय जिनेन्द्र।

B-जय जिनेन्द्र।

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