एक लेख मन की कलम से

यद्यपि ये एक चर्चा का ब्लॉग है, फिर भी मैं यहाँ अपने मन के कुछ भावो को व्यक्त कर रही हूँ |

प्रायः जो भी मुझसे पहली बार मिलता है या बात करता है उसका एक सवाल रहता ही है | ऐसा ही सवाल कल फिर से सामने आया था | सवाल है की “आपकी जैन धर्म में इतनी रूचि क्यों है ?” | कुछ लोगो के लिए ये रूचि होती है, कुछ के लिए एक obsession | मेरे लिए शायद मेरी जीवन जीने की प्रेरणा |

हमारे पास अगर कोई वस्तु आसानी से आ जाती है तो हमे उसकी कदर नहीं होती, ऐसा हमारे साथ अक्सर होता है | या फिर किसी व्यक्ति के जाने के बाद हमे उसके प्रति अचानक से प्रेम उमड़ता है और हम सोचने लगते हैं की हमने ऐसा किया होता तो कितना अच्छा होता | पर तब तक वो व्यक्ति या वस्तु जा चुकी होती है |

कभी-कभी ऐसा भी देखा जाता है की हम किसी चीज़ को पाने के लिए बहुत दिन से प्रयास कर रहे हों और तब वो चीज़ हमे मिले तो हम उसकी बहुत सम्हाल करते हैं | क्यूंकि हमे उसका मूल्य पता होता है | जो कठिनाईयाँ हमने उसको पाने में झेली है वो बस हम ही जानते हैं |

ऐसा ही मेरे साथ भी है | मुझे अजैन घर में कभी जैन धर्म की कहानियाँ सुनने या फिर तीर्थ यात्रा पर जाने का मौका नहीं मिला | न ही कभी किसी रिश्तेदार ने मुझसे पूछा की आज स्वाध्याय किया क्या? मैं जहाँ भी परिचितों के यहाँ, शादी – पार्टी के आयोजनों में गयी वहां हमेशा राग-रंग, खाने-पिने आदि की ही बातें सुनने को मिलती |

फिर एक दिन अचानक पता नहीं कहा से इस बुद्धि में कुछ समझ आयी की मैंने अपनी नानी के यहाँ होने वाले ग्रीष्म कालीन जैन शिविर में बाल बोध पाठमाला का अध्ययन किया | उन ८ दिनों में शायद मेरी रूचि जैन धर्म को जानने की हुई | मेरी मम्मी का ये बहुत बड़ा उपकार है की नानी के यहाँ से वापिस आने के बाद उन्होंने मुझे पाठशाला भेजा और उस एक छोटी सी जिज्ञासा को बड़ा रूप दिया | अगर उन्होंने मुझे पाठशाला नहीं भेजा होता तो वो जिज्ञासा रूचि में कभी परवर्तित नहीं हो पाती | ये तो बात हुई की मैं कैसे जैन धर्म से परिचित हुई |

अब बात आती है की मुझे इतनी रूचि क्यों है ? इसका एक मात्र कारण ये ही बनता है की मुझे ये बात सुलभता से नहीं मिली शायद इसीलिए मुझे उसकी कदर है | या फिर शायद पूर्व भव के कुछ संस्कार हैं जिनका असर इस भव में दिखाई पड़ता है |

मुझे इस बात का अफ़सोस बहुत होता था की मैंने जैन घर में जन्म नहीं लिया पर जब मैं अपने कुछ अभागे साधर्मियों को जैन धर्म की महिमा न समझ कर उसके मूल सिद्धांतों को उड़ाकर गृहस्थ के सामान्य सदाचार का पालन न कर उनके जैन कुल का मजाक बनाते देखती हूँ; तो मुझे लगता है की मेरे अजैन घर में जन्म लेने से मैंने जैन धर्म की महिमा तो जानी है | वैसे भी जैन धर्म इतना महान है की जिसकी परिभाषा में कुल या परिवार न आकर जिनेन्द्र देव का मार्ग आता है |

ये तो मेरा महा पुण्य का उदय है जो मैंने इस बात को इतनी रूचि से सुना | कुछ लोगो को ऐसा लगता होगा की मैं कितनी धर्मात्मा हूँ पर मुझे तो अपना झुकाव धर्म की ओर कम होता ही दिखा है | ये जो मैं इतने उत्तर लिखती हूँ और जो भी प्रयास मेरा है वो सब तो मेरा पहले का सीखा हुआ है | आज तो मैं कुछ भी नया नहीं सिख रही हूँ |

मेरी नानी जी ने एक बार कहा था हम इस मनुष्य भव और जैन धर्म को ऐसे विषयो में गवा रहे हैं और अपना पुण्य क्षीण कर रहे हैं जैसे कोई खुद के पैसों का ढेर माचिस से आग लगा कर जला दे |

कहना बहुत कुछ है पर अब यही विराम लेती हूँ | आशा है आपके सवाल का जबाब आपको मिला होगा |

जय जिनेन्द्र !

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